19 May, 2024

सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला

सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला

अरशद नदीम

चुनाव की विश्वसनीयता पर अक्सर अपोज़िशन पार्टियां प्रश्न चिन्ह लगाती रही हैं। कांग्रेस ने तो इस बार खुलकर कहा की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानि वी एम से चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं इस से पहले आम आदमी पार्टी भी वी एम की विश्वसनीयता पर सवाल कर चुकी है विपक्षी दलों ने कई बार कहा है की जब तक वी एम से चुनाव होते रहेंगे तब तक केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को कोई शिकस्त नहीं दे सकता इस बार तो यह विवाद इतना बढ़ा की विदेशों से भी भारत सरकार को नसीहत दी जाने लगी की वह अपने चुनाव को निष्पक्ष ईमानदारी से संपन्न कराये। इस दौरान उच्तम नियालय ने एक फैसला सुनते हुए कहा है की वी वी पेट तथा वी एम की पर्चियों का मिलान कराया जाये ताकि किसी तरह का कोई शक या मतदाता के दिल में शंखा रहे

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से जुड़ी एक सहायक प्रणाली, वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) का समावेश व इस्तेमाल और प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के किसी भी पांच मतदान केंद्रों के वीवीपैट में दर्ज मतों की गिनती का ईवीएम में दर्ज मतों की गिनती से मिलान का प्रावधान भारतीय चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल के आलोचकों को आश्वस्त नहीं कर पाया है। कुछ लोगों का यह सुझाव है कि किसी भी दुर्भावनापूर्ण कार्यकलाप की आशंका को दूर करने के वास्ते की जाने वाली पड़ताल के लिहाज से अगर ईवीएम की मतपत्र इकाई (बैलट यूनिट) में दर्ज किए गए मतों और वीवीपैट में मुद्रित पर्चियों के अलावा ‘मशीन ऑडिट ट्रेल सिस्टम’ में दिए गए तमाम निदेशों (कमांड) को बरकरार रखा जाए, तो यह प्रक्रिया और भी ज्यादा पारदर्शी बन सकता है। यह कदम वाकई पूरी प्रणाली को और ज्यादा मजबूत बना सकता है तथा इसे मौजूदा मशीनों के एक उन्नयन (अपग्रेड) के तौर पर माना जा सकता है। कुछ दूसरे लोगों का कहना है कि वीवीपैट के इस्तेमाल ने उन संभावित खतरों को उजागर किया है, जो किसी नेटवर्क से जुड़े बिना खुद-ब-खुद काम कर सकने की ईवीएम की (स्टैंडअलोन) की प्रकृति और विरासत प्रणाली (लिगेसी सिस्टम) के अंतर्गत आने वाले तकनीकी व प्रशासनिक सुरक्षा उपायों में मौजूद नहीं थे। इससे भी सुरक्षा संबंधी उपायों को नए सिरे से मजबूत करके निपटा जा सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वीवीपैट से लैस प्रणाली ‘स्टैंडअलोन’ ईवीएम की तरह ही सुरक्षित और विश्वसनीय रहे। लेकिन कांग्रेस जैसे विभिन्न राजनीतिक दलों सहित कई लोगों की यह आलोचना समझ से परे है कि पूर्ण पारदर्शिता की खातिर पुनर्गणना की संख्या का नमूना लेने की मौजूदा पद्धति के बजाय, सभी वीवीपैट की सिर्फ शत-प्रतिशत पुनर्गणना ही पर्याप्त व उपयुक्त होगी। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मांग से संबंधित विभिन्न याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

कदाचार और ईवीएम-हैकिंग के बारे में तमाम भारी-भरकम कथनों के बावजूद, अब तक ईवीएम के साथ किसी वास्तविक छेड़छाड़ का कोई सबूत नहीं मिला है। हालांकि, जैसा कि किसी भी मशीन में होता है, ईवीएम में भी कई गड़बड़ियां आई हैं और मशीन के विफल हो जाने की स्थिति में उन्हें तुरंत बदल दिया गया है, लेकिन मौजूदा तकनीकी एवं प्रशासनिक सुरक्षा उपायों के बावजूद उनमें हैकिंग या हेरफेर की संभावना संबंधी आलोचना कोई भी वास्तविक सबूत के साथ नहीं की गई है। मिसाल के तौर पर, 2019 के आम चुनाव और कई अन्य विधानसभा चुनावों में वीवीपैट की नमूना गिनती से पता चला है कि वीवीपैट की पुनर्गणना और ईवीएम की गिनती बहुत ही कम बेमेल रही है। यह वास्तविक मतदान प्रक्रिया से पहले मशीन में दर्ज दिखावटी मतदान (मॉक पोल) को न हटाने या मशीन से प्राप्त अंतिम गिनती को भौतिक रूप से दर्ज (मैन्युअल रिकॉर्डिंग) करने में हुई गलती जैसी छोटी-मोटी त्रुटियों का नतीजा रहा है। वीवीपैट की नमूना गिनती एक मतदाता को इस बात की पुष्टि करने की इजाजत देती है कि उसका मत ईवीएम में उसके द्वारा दर्ज किए गए विकल्प से मेल खाता है या नहीं। प्रांत के आकार के आधार पर प्रत्येक राज्य/केंद्र-शासित प्रदेश के कुछ विधानसभाओं को चुनकर इसे सांख्यिकीय रूप से और ज्यादा महत्वपूर्ण बनाने के लिए पुनर्गणना के नमूने में बढ़ोतरी या फिर सिर्फ उन सीटों पर जहां जीत का अंतर बहुत ही कम (मसलन, कुल वोटों का एक फीसदी से भी कम) है, पुनर्गणना के नमूने को बढ़ाकर इस समस्या का समाधान किया सकता है। लेकिन पूर्ण पुनर्मतगणना पर जोर देना अतिशयोक्ति और ईवीएम में भरोसे की स्पष्ट कमी को दर्शाता है।

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